यीशु पानी पर क्यों चले?

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यीशु अपने शिष्यों के कमजोर विश्वास को मजबूत करने के लिए पानी पर चला। उत्कृष्ट पुस्तक “युगों-युगों की चाह” के अध्याय 40 से निम्नलिखित वाक्यांश इस अद्वितीय अनुभव का सबसे अच्छा वर्णन करता है:

हजारों लोगों को खिलाने के चमत्कार के बाद, “अपने इस जोश में लोग तैयार हो गए कि उसे इसी समय राजा घोषित कर दिया जाए। वे देख रहे हैं कि वह अपनी ओर आकर्षित करने के लिए, और अपने आप को आदर सम्मान प्राप्त करने के लिए कोई भी श्रयास नहीं करता है।इन बातों में अवश्य ही याजकों और शासकों से विल्कुल अलग है, और उनको भय होने लगा कि वह कभी भी दाऊद के सिंहासन के लिए दावा नहीं करेगा। आपस में सलाह करने के बाद फैसला किया कि उसे पकड़ कर बलपूर्वक इस्राएलियों का राजा घोषित कर देंगे। चेले भी इस बात के लिए लोगों के साथ हो गए कि दाऊद के सिंहासन का राजा घोषित करने के लिए उनका गुरू सही व्यक्ति है। उन्होंने कहा, यह तो मस्तीह की सज्जनता है जिसके कारण से वह इस सम्मान को नहीं चाहता है। आइए हम सब लोग अपने मुक्तिदाता की प्रशंसा और बड़ाई करें | इन हठी याजकों और शासकों को मजबूर कर देंगे कि वे उसका सम्मान करें जो परमेश्वर के अधिकार को लेकर मनुष्य के शरीर में हमारे पास आया है।

उन्होंने बड़ी व्यग्रता के साथ अपने उद्देश्य को पूरा करना चाहा, परन्तु यीशु तो देखता है कि आगे क्या है, वह समझता है जब कि वे नहीं जानते कि इस चाल का परिणाम क्या होगा । अभी भी याजक और शासक उसकी जान लेने की ताक में हैं। उनका आरोप है कि वह उनके लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। यदि वे लोग उसे सिंहासन पर बैठाने का प्रयास करेंगे तो हिंसा और बलवा हो जाएगा, और आत्तिक राज्य के कार्य में रुकावट आ जाएगी। बिना देरी किए जल्दी से इस आन्दोलन को रोकना पड़ेगा। यीशु ने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा कि जल्दी से अपनी नाव लें और तुरन्त कफरनहूम को चल दें, तब तक-वह स्वयं इन लोगों को बिदा करेगा।

इस से पहले यीशु ने कभी ऐसी आज्ञा नहीं दिया था, जिसे पूरा करना असम्भव लग रहा था। चेलों को तो बहुत दिनों से आशा थी कि इस : आन्दोलन द्वारा यीशु को सिंहासन पर बैठा दिया जाएगा; वे इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि यह सारा जोश बिना किसी परिणाम के ठंडा पड़ जाए। लोग जो फसह पर्व्व के लिए इकट्ठे हो रहे थे, वे नए भविष्यद्वक्ता को देखने के लिए आतुर थे। उसके अनुयायियों के लिए तो यह एक सुनहरां अवसर था कि अपने प्रिय गुरू को इस्राएल के सिंहासन पर देखें | इस नई अभिलाषा की चाह में उनके लिए अपने आप को उससे दूर ले जाना, और यीशु को उस निर्जन किनारे पर अकेला छोड़ जाना बहुत कठिन था। इस विचार का उन्होंने विरोध किया; परन्तु यीशु ने अब ऐसे अधिकार के साथ बोला जैसा कि इस से पहले उनके प्रति कभी नहीं किया था।  उनको मालूम था कि अब और अधिक विरोध जताना उनके लिए व्यर्थ होगा, और चुपचाप समुद्र की ओर चले गए।

अब यीशु उस भीड़ को चले जाने का आदेश देता है; और उसके कहने का भाव इतना दृढ़ता लिए हुए था कि उसको न मानने के लिए उनमें साहस नहीं था। उनके मुंह से प्रशंसा और स्तुति के शब्द निकलने बन्द हो गए | उसको घेर लेने के लिए उठते हुए कदम रुक गए और उनके चेहरों से खुशी और लालसा भरी नज़रें धूमिल हो गईं | उस भीड़ में बहुत से लोग मजबूत दिमाग वाले तथा दृढ़निश्चयी थे; परन्तु राजाओं जैसी पहचान और आदेश भरे शब्दों ने उस कोलाहल को शान्त कर दिया, और उनकी चाह को निरर्थक बना दिया। उन्होंने उसमें ऐसी शक्ति देखी जो संसार के किसी भी अधिकारी में नहीं थी, और बिना किसी प्रश्न के उन्होंने वहां से जाना स्वीकार कर लिया।

जब यीशु अकेला रह गया तब वह, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया |“ लगातार घन्टों वह परमेश्वर से विनती करता रहा। अपने लिए नहीं परन्तु पूरी मानव जाति के लिए प्रार्थना करता रहा। उसने प्रार्थना किया कि उसे शक्ति दे कि वह लोगों पर ईश्वरीय उद्देश्य को प्रगट कर सके, ताकि शैतान उनकी समझ को अन्धा न बना दे और उनके न्याय को नबिगाड़ दे। उद्धारकर्त्ता को मालूम था कि इस धरती पर उसकी व्यक्तिगत ‘ सेवकाई के दिन लगभग समाप्त होने वाले हैं, और थोड़े ही ऐसे होंगे जो उसे मुक्तिदाता मानकर ग्रहण करेंगे। आत्मा की संघर्ष पूर्ण वेदना के साथ उसने शिष्यों के लिए प्रार्थना किया | वे लोग बड़ी कठिनाई भरी परीक्षा में पड़ेंगे। उनकी लम्बी अभिलाषाओं की आशा, जो उनके भ्रमजाल के कारण उभरी थी, बड़े दर्दनाक और तिरस्कार पूर्ण तरीके से निराशा भर देगी | उसे दाऊद के सिंहासन पर विराजमान होते हुए देखने के स्थान पर, उसको क्रूस पर चढ़े हुए देखेंगे। यद्यपि यही उसका सही अभिषेक होगा। परन्तु वे लोग इसे समझ नहीं सके, परिणाम स्वरूप उन पर बड़ी कठिन परीक्षाएं आएंगी, जिसे वे परीक्षा के रूप में पहचान नहीं पाएंगे। बिना पवित्र आत्मा के दिमाग और ज्ञान को प्रकाशित किए हुए, शिष्यों का विश्वास असफल हो जाएगा……….

जैसा कि यीशु ने आदेश दिया था, चेले लोग तुरन्त वहां से नहीं गए। उन्होंने कुछ समय तक इस आशा में प्रतीक्षा किया कि वह उनके पास आएगा। परन्तु जब उन्होंने देखा कि बहुत शीघ्र ही अंधेरा होने वाला है तो वे, “नाव पर चढ़कर झील के पार कफरनहूम को जाने लगे ।“ उन्होंने यीशु को अप्रसन्नता भरे हृदय से वहां पर छोड़ा, क्योंकि जब से उन्होंने उसे अपना प्रभु करके स्वीकार कर लियां था, उसके बाद से कभी भी इतने अधीर नहीं हुए थे। वे कुड़कुड़ाने लगे क्योंकि उसने उन्हें अनुमति नहीं दी थी कि वे उसे राजा घोषित करें | वे अपने आप को दोषी ठहराने लगे कि क्यों उन्होंने उसके आदेश को स्वीकार कर लिया | अपने आप से ही तर्क करने लगे कि यदि वे उससे दृढ़ता पूर्वक आग्रह करते तो शायद अपने उद्देश्य में सफल हो जाते।

उनके हृदय और दिमाग पर अविश्वास की छाया गहराती जा रही थी । सम्मान पाने की चाह ने उन्हें अंधा कर रखा था। वे जानते थे कि फरीसी लोग यीशु से घृणा करते हैं, वे बड़ी व्यग्रता से चाहते थे कि जैसा उसके साथ होना चाहिए वैसा ही उसका आदर और सम्मान बढ़े । एक ऐसे गुरू के साथ रहने से जो महान चमत्कार कर सकता है, फिर भी उसकी निन्दा करना और उसे धोखेबाज कहना उनके लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा थी जिसे वे सहन नहीं कर सकते थे | क्‍या वे लोग हमेशा एक झूठे भविष्यद्बक्ता के अनुयायी कहलाते जाएंगे ? क्या मसीह कभी भी अपने आप को एक राजा के रूप में स्वीकार नहीं करेगा ? जिसके पास इतनी महान शक्ति है वह अपने असली चरित्र को क्‍यों नहीं जाहिर करता और उनके मार्ग को आसान बना देता ? उसने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को उस हिंसक मृत्यु से क्यों नहीं बचाया ? इस प्रकार से चेले तर्क वितर्क तब तक करते रहे जब तक उनकी आत्मिकता पर गहरा अंधेरा नहीं छा गया । उनके मन में प्रश्न उठने लगा कि जैसा कि फरीसी लोग कहते हैं, क्या यीशु एक पाखण्डी है ?

एक हिंसक तूफान उनकी ओर बढ़ रहा था, और वे लोग उसके लिए तैयार नहीं थे । जो पूरा दिन शान्त और खुशी से भरा हुआ बीता था, बिल्कुल उसके विपरीत अचानक हो गया, और जब प्रचण्ड आंधी आकर उनसे टकराई तो वे डर गए। वे अपनी असन्तुष्टता, अपने अविश्वास और अपनी अधीरता को भूल गए | हर कोई नाव को डूबने से बचाने के लिए अपनी शक्ति भर कोशिश करने लगा । जहां पर यीशु से मिलना था वह स्थान बेतेहसदा से कुछ ही दूरी पर था, और सामान्य मौसम में कुछ ही घन्टों की यात्रा थी, परन्तु इस समय वे लोग गन्तब्य स्थान से दूर ही दूर होते जा रहे थे। वे लोग रात के चौथे पहर तक किनारे पहुंचने की कोशिश करते रहे। और फिर थक हार कर इन लोगों ने अपने प्रयास को छोड़ दिया। इस आंधी और तूफान से भरे समुद्र ने उन्हें अपनी असहाय दशा का एक पाठ सिखा दिया था, और अब वे अपने गुरू की उपस्थिति की चाह करने लगे।

यीशु उन्हें भूला नहीं था। देखने वालों ने किनारे से देखा कि वे लोग हवा और पानी की लहरों से भयभीत होकर संघर्ष कर रहे हैं। वह अपने… शिष्यों को क्षण भर के लिए भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने दिया। गहरी उत्कण्ठा के साथ उसकी नज़रें तूफान में फंसी नाव का पीछा कर रही थीं जिन पर बैठे लोग आगे चल कर संसार को प्रकाश देने वाले होंगे। जिस प्रकार से एक मां अपने बच्चे को प्यार भरी नज़र से देखती है, उसी प्रकार से दयालु स्वामी अपने शिष्यों को देख रहा था। जब उन्होंने अपनी अपवित्र अभिलाषा को कुचल दिया और उनके हृदय कुछ शान्त हुए, और एक इन्सान के रूप में सहायता के लिए विनती करने लगे, तो उन्हें सहायता मिली ।

जिस क्षण वे अपने आप को समाप्त समझ रहे थे, उसी क्षण एक धूमिल से प्रकाश में उन्होंने देखा कि कोई अस्पष्ट छाया पानी पर चलते हुए उनकी ओर आ रही है। परन्तु उन्हें यह नहीं मालूम था कि वह यीशु है, जो उस घड़ी उनकी सहायता के लिए आ रहा था, उन्होंने उसे कोई शत्रु समझा । अब उन पर पूर्ण रूप से आतंक छा गया | जिन हाथों ने कसकर पतवार थाम रखा था, उनके हाथ ढीले पड़ गए। उनकी नाव लहरों के थपेड़ों से डगमगाने लगी; सभी लोगों की नज़रें उस सफेद वस्त्र पहिने और समुद्र की लहरों पर चलते हुए आती हुई छाया पर ठहर गई थीं ।

उन्होंने सोचा कि यह कोई भूत है जो उनको नष्ट करने के लिए आ : रहा है, और वे डर के मारे जोर-जोर से चिल्‍लाकर सहायता मांगने लगे | यीशु आगे बढ़ता रहा और ऐसा लगा कि वह उनके पास से आगे चला जाएगा, परन्तु उन्होंने उसे पहचान लिया; और उस से मदद के लिए चिल्ला पड़े। उनका प्रिय स्वामी मुड़ता है और उसकी आवाज़ ने, ढाढ़स बांधो, मैं हूं; डरो मत, “उनके भय को समाप्त कर देती है।”

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परमेश्वर की सेवा में,
BibleAsk टीम

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