(138) चरित्र की पूर्णता

चरित्र की पूर्णता

1. हमें सब्र रखने के लिए क्यों उकसाया जाता है?
“पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे॥” (याकूब 1:4)।

2. मसीह हमें कितना सिद्ध बताते हैं?
“इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥” (मत्ती 5:48)।

3. हम किसमें पूर्ण हैं?
“और तुम उसी में भरपूर हो गए हो जो सारी प्रधानता और अधिकार का शिरोमणि है।” (कुलुस्सियों 2:10)।

4. मसीह को ग्रहण करने के बाद, हमें क्या करना है?
“इसलिये आओ मसीह की शिक्षा की आरम्भ की बातों को छोड़ कर, हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएं, और मरे हुए कामों से मन फिराने, और परमेश्वर पर विश्वास करने।” (इब्रानियों 6:1)।

5. मसीही को किसमें बढ़ना है?
“पर हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ। उसी की महिमा अब भी हो, और युगानुयुग होती रहे। आमीन॥” (2 पतरस 3:18)।

6. एक व्यक्ति अनुग्रह में कैसे बढ़ सकता है?
और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्न करके, अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ।
और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति।
और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ।
क्योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्फल न होने देंगी।” (2 पतरस 1:5-8)।

7. मसीह अपने अनुयायियों में इस वृद्धि की इच्छा क्यों रखता है?
“और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बना कर अपने पास खड़ी करे, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन पवित्र और निर्दोष हो।” (इफिसियों 5:27)।

8. किस बात से मसीही बढ़ेंगे?
“नये जन्मे हुए बच्चों की नाईं निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ।” (1 पतरस 2:2)।

9. परमेश्वर के वचन के अनुसार बढ़ने के लिए, एक व्यक्‍ति को क्या करना चाहिए?
“जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया, और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनन्द का कारण हुए; क्योंकि, हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मैं तेरा कहलाता हूँ।” (यिर्मयाह 15:16)।

“मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूं।” (भजन संहिता 119:11; कुलुस्सियों 3:16 देखें)।

10. फिर विश्वासी के लिए परमेश्वर का वचन क्या बन जाता है?
“और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनन्द का कारण हुए; क्योंकि, हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मैं तेरा कहलाता हूँ।” (यिर्मयाह 15:16, अंतिम भाग)।

11. शास्त्र क्यों दिए गए हैं?
16 हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है।
17 ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए॥” (2 तीमुथियुस 3:16,17)।

12. बुद्धि की कमी को कैसे पूरा किया जा सकता है?
“पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उस को दी जाएगी” (याकूब 1:5)।

13. हम कितनी बातों में परमेश्वर से मदद माँग सकते हैं?
“किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।” (फिलिप्पियों 4:6)।

14. सिद्धता का सबूत क्या है?
“इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं: जो कोई वचन में नहीं चूकता, वही तो सिद्ध मनुष्य है; और सारी देह पर भी लगाम लगा सकता है।” (याकूब 3:2)।

15. पूर्णता का बंधन क्या है?
“और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो।” (कुलुस्सियों 3:14; देखें फिलिपियों 3:13,14; इब्रानियों 12:14)।

16. परमेश्वर हमें कितना सिद्ध बनाता है?
“शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।” (1 थिस्स 5:23)।

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